निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
nirmamo nirahaṅkāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣamī ||
अद्वेष्टा = द्वेषरहित; सर्वभूतानाम् = सब प्राणियों में; मैत्रः = मित्रभाव रखने वाला; करुणः = दयालु; एव च = तथा; निर्ममः = ममतारहित; निरहङ्कारः = अहङ्काररहित; समदुःखसुखः = सुख-दुःख में सम; क्षमी = क्षमाशील।
जो पुरुष सब प्राणियों में द्वेषभाव से रहित, सबका मित्र और दयालु है, ममतारहित, अहङ्काररहित, सुख-दुःख की प्राप्ति में सम और क्षमाशील है... वह भक्त मुझे प्रिय है। (गीताप्रेस कोड 502)