तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
teṣāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣemaṁ vahāmy aham ||
अनन्याः = अनन्य भाव से; चिन्तयन्तः = चिन्तन करते हुए; माम् = मुझको; ये = जो; जनाः = भक्तजन; पर्युपासते = भजते हैं; तेषाम् = उन; नित्याभियुक्तानाम् = नित्य युक्त पुरुषों का; योगक्षेमम् = योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा); वहामि = वहन करता हूँ; अहम् = मैं।
जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर का निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य-युक्त पुरुषों का योगक्षेम (अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ। (गीताप्रेस कोड 502)