Shloka 2.14
Gita Press Code 502
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
mātrā-sparśās tu kaunteya śītoṣṇa-sukha-duḥkha-dāḥ |
āgamāpāyino 'nityās tāṁs titikṣasva bhārata ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
मात्रास्पर्शाः = इन्द्रियों और विषयों के संयोग; तु = तो; कौन्तेय = हे कुन्तीपुत्र; शीतोष्णसुखदुःखदाः = शीत-उष्ण और सुख-दुःख देनेवाले हैं; आगमापायिनः = उत्पत्ति-विनाशशील; अनित्याः = क्षणभंगुर; तान् = उनको; तितिक्षस्व = सहन करो; भारत = हे भरतवंशी अर्जुन।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो शीत-उष्ण और सुख-दुःख को देने वाले, उत्पत्ति-विनाशशील तथा अनित्य हैं; इसलिए हे भारत! तुम उनको सहन करो। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "O son of Kunti, the contacts between the senses and their objects, which give rise to the feelings of heat and cold, pleasure and pain, are transitory and fleeting. Endure them patiently, O descendant of Bharata."
Shloka 2.20
Gita Press Code 502
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
na jāyate mriyate vā kadācin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ |
ajo nityaḥ śāśvato 'yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
न जायते = न कभी जन्मता है; वा = और; म्रियते = मरता है; कदाचित् = किसी काल में; न = न; अयम् = यह आत्मा; भूत्वा = उत्पन्न होकर; भविता = फिर होने वाला; वा = अथवा; न भूयः = पुनः नहीं; अजः = अजन्मा; नित्यः = नित्य; शाश्वतः = सनातन; अयम् = यह; पुराणः = पुरातन; न हन्यते = नहीं मारा जाता; हन्यमाने शरीरे = शरीर के मारे जाने पर भी।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्म लेता है और न मरता ही है; तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "The Soul is never born nor does it ever die; nor having once been, does it ever cease to be. Unborn, eternal, ever-existing, and primeval, it is not slain when the body is slain."
Shloka 2.22
Gita Press Code 502
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
vāsāṁsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro 'parāṇi |
tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny anyāni saṁyāti navāni dehī ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
वासांसि = वस्त्रों को; जीर्णानि = पुराने; यथा = जैसे; विहाय = त्यागकर; नवानि = नए; गृह्णाति = ग्रहण करता है; नरः = मनुष्य; अपराणि = दूसरे; तथा = वैसे ही; शरीराणि = शरीरों को; विहाय = त्यागकर; जीर्णानि = पुराने; अन्यानि = दूसरे; संयाति = प्राप्त होता है; नवानि = नए; देही = जीवात्मा।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "Just as a person casts off worn-out garments and puts on new ones, so does the embodied soul cast off worn-out bodies and enter into new ones."
Shloka 2.47
Gita Press Code 502
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana |
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
कर्मणि = कर्म करने में; एव = ही; अधिकारः = अधिकार; ते = तुम्हारा; मा = न हो; फलेषु = फलों में; कदाचन = कभी भी; मा = मत; कर्मफलहेतुः = कर्मफल का हेतु; भूः = बनो; मा = न; ते = तुम्हारा; सङ्गः = आसक्ति; अस्तु = हो; अकर्मणि = कर्म न करने में।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत बन तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "You have a right to perform your prescribed duty, but you are not entitled to the fruits of your actions. Never consider yourself the cause of the results of your activities, nor be attached to inaction."
Shloka 2.48
Gita Press Code 502
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya |
siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga ucyate ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
योगस्थः = योग में स्थित होकर; कुरु = करो; कर्माणि = कर्मों को; सङ्गम् = आसक्ति को; त्यक्त्वा = त्यागकर; धनञ्जय = हे धनञ्जय; सिद्ध्यसिद्ध्योः = सिद्धि और असिद्धि में; समः = सम; भूत्वा = होकर; समत्वम् = समत्व ही; योगः = योग; उच्यते = कहा जाता है।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
हे धनञ्जय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; समत्व ही योग कहलाता है। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "Perform your duties established in Yoga, casting off attachment, O Dhananjaya, and remaining equanimous in success and failure. Equanimity of mind is called Yoga."
Shloka 2.62
Gita Press Code 502
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
dhyāyato viṣayān puṁsaḥ saṅgas teṣūpajāyate |
saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho 'bhijāyate ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
ध्यायतः = चिन्तन करने वाले; विषयान् = विषयों का; पुंसः = पुरुष की; सङ्गः = आसक्ति; तेषु = उनमें; उपजायते = उत्पन्न हो जाती है; सङ्गात् = आसक्ति से; सञ्जायते = उत्पन्न होती है; कामः = कामना; कामात् = कामना से; क्रोधः = क्रोध; अभिजायते = उत्पन्न होता है।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "Brooding on the objects of senses develops attachment to them; from attachment springs desire, and from unfulfilled desire flares up anger."
Shloka 2.70
Gita Press Code 502
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
āpūryamāṇam acala-pratiṣṭhaṁ samudram āpaḥ praviśanti yadvat |
tadvat kāmā yaṁ praviśanti sarve sa śāntim āpnoti na kāma-kāmī ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
आपूर्यमाणम् = सब ओर से परिपूर्ण; अचलप्रतिष्ठम् = अचल प्रतिष्ठा वाले; समुद्रम् = समुद्र में; आपः = नदियाँ; प्रविशन्ति = प्रवेश करती हैं; यद्वत् = जैसे; तद्वत् = वैसे ही; कामाः = भोग; यम् = जिस पुरुष में; प्रविशन्ति = प्रवेश करते हैं; सर्वे = सब; सः = वह; शान्तिम् = शान्ति को; आप्नोति = प्राप्त होता है; न = नहीं; कामकामी = भोगों की कामना करने वाला।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
जैसे सब ओर से परिपूर्ण और अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में नदियाँ बिना उसे विचलित किए समा जाती हैं, वैसे ही जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में सब भोग बिना विकार उत्पन्न किए समा जाते हैं, वही परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "As the ocean remains unruffled while waters continually flow into it from all sides, so that person alone attains peace into whom all desires enter without causing disturbance, not the one who longs for desires."