असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥
asakto hy ācaran karma param āpnoti pūruṣaḥ ||
तस्मात् = इसलिए; असक्तः = अनासक्त होकर; सततम् = निरन्तर; कार्यम् कर्म = कर्तव्य कर्म; समाचर = भली-भाँति करो; असक्तः = अनासक्त रहकर; हि = क्योंकि; आचरन् = करता हुआ; कर्म = कर्म; परम् = परम पद (मोक्ष) को; आप्नोति = प्राप्त होता है; पूरुषः = मनुष्य।
इसलिए तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर अपने कर्तव्य कर्म का भली-भाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। (गीताप्रेस कोड 502)