Shloka 4.7
Gita Press Code 502
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata |
abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmy aham ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
यदा यदा = जब-जब; हि = निश्चय ही; धर्मस्य = धर्म की; ग्लानिः = हानि; भवति = होती है; भारत = हे भारत; अभ्युत्थानम् = वृद्धि; अधर्मस्य = अधर्म की; तदा = तब-तब; आत्मानम् = अपने रूप को; सृजामि = प्रकट करता हूँ; अहम् = मैं।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से प्रकट होता हूँ। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "Whenever there is a decline of righteousness, O Bharata, and a rise of unrighteousness, then I manifest Myself."
Shloka 4.8
Gita Press Code 502
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya ca duṣkṛtām |
dharma-saṁsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ||
पदच्छेद एवं अन्वय (Word-by-word Anvaya):
परित्राणाय = उद्धार करने के लिए; साधूनाम् = साधु पुरुषों का; विनाशाय = विनाश करने के लिए; च = और; दुष्कृताम् = पापकर्म करने वालों का; धर्मसंस्थापनार्थाय = धर्म की भली-भाँति स्थापना करने के लिए; सम्भवामि = प्रकट होता हूँ; युगे युगे = युग-युग में।
गीताप्रेस हिन्दी भावार्थ:
साधु पुरुषों के उद्धार के लिए, पापकर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म की भली-भाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ। (गीताप्रेस कोड 502)
English Translation: "For the protection of the good, for the destruction of the wicked, and for the firm re-establishment of righteousness, I appear age after age."